असल सवाल हैं कि पुलिस, जेल, जुडिशरी और लीगल एड, जैसी जिन संस्थाओं पर न्याय देने का दायित्व है, उनके पास अपने काम को पूरा करने के लिए ज़रूरी बुनियादी नींव है?
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विरोध का अधिकार और पुलिस की जवाबदेही
दो ही संभावनाएं सामने आती हैं। या तो कमान और नियंत्रण की पूरी व्यवस्था विफल हो गई थी, या फिर इस हिंसा को ऊपर से मंज़ूरी मिली हुई थी।
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रोज़मर्रा के जीवन में न्याय की क़ानूनी हक़ीक़त
‘कंज़्यूमर जस्टिस रिपोर्ट 2026’ हमें याद दिलाती है कि न्याय केवल आपराधिक क़ानूनों या संवैधानिक अधिकारों तक सीमित नहीं है। यह हमारे रोज़मर्रा के लेनदेन में भी मौजूद है, जो हमारे जीवन का अहम हिस्सा हैं।
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क्या न्यायपालिका पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए तैयार है?
अदालतों व न्यायाधीशों के प्रति सम्मान दो स्तंभों पर टिका होता है, पारदर्शिता और जवाबदेही। न्यायाधीशों को भी अपनी कार्यप्रणाली के प्रति सार्वजनिक रूप से जवाबदेह होना चाहिए।
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न्याय तक पहुंच की पहली सीढ़ी कमज़ोर क्यों?
पर्याप्त संसाधनों के बिना संविधान में निहित समान और सुलभ न्याय का वादा पूरा नहीं हो सकता।
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जब महिला हिंसा को अपराध न माना जाए
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति को पत्नी के साथ बलात्कार, अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने और लापरवाही से मृत्यु के आरोपों में बरी कर दिया। यह फ़ैसला मैरिटल रेप पर विरोधाभासों व विसंगतियों को उजागर करता ह
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जेलों में भीड़: न्याय व्यवस्था का अनदेखा संकट
जेलों में बंद दो-तिहाई लोग वर्षों तक मुक़दमे का इंतज़ार करते हैं। क्या इससे इनकार किया जा सकता है कि व्यवस्था दोष साबित होने से पहले ही उन्हें सज़ा भुगतने पर मजबूर कर रही है।
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तिहाड़ जेल के बहाने दिल्ली की जेलों की हक़ीक़त
तिहाड़ में ऐसी अनगिनत कहानियां हैं। ऐसी कहानियां जिन्हें कोई बताना नहीं चाहता और जिन्हें सुनने के लिए भी शायद ही कोई तैयार हो।
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मानवाधिकारों के प्रहरी आयोग ही कमज़ोर
दो दशक बाद भी राज्य मानवाधिकार आयोगों के गठन से जुड़ी उम्मीद पूरी नहीं हो सकी है। इन्हें लोगों के अधिकारों की रक्षा करने, ज़मीनी स्तर पर सक्रिय और स्वतंत्र निगरानी वाले संस्थान के रूप में गठित किया गय
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दिल्ली चुनाव: घोषणापत्रों में न्याय क्षेत्र की अनदेखी
न्याय व्यवस्था को लेकर आमतौर पर कम ही चर्चा होती है। जनता की ओर से मांग न होने पर राजनीतिक दल भी चुनावी घोषणापत्रों में न्याय व्यवस्था के मुद्दों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
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अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हटते उपभोक्ता आयोग
राज्य और ज़िला उपभोक्ता आयोगों में ख़ाली पदों और लंबित मामलों ने उपभोक्ता न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमज़ोर कर दिया है।
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एक दिन में जेल की समस्याएं समझ नहीं आएंगी
भारत की जेलों की हालत चिंताजनक है। हमारी जेलें एक लापरवाह और असफल न्याय व्यवस्था का बोझ उठा रही हैं।
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क्या हम किशोरों के पुनर्वास के लिए तैयार हैं?
देश भर में हर वर्ष हज़ारों की संख्या में किशोरों को निरुद्ध किया जाता है। उनकी देखरेख के लिए केवल 197 परिवीक्षा अधिकारी हैं।