क्या न्यायपालिका पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए तैयार है?
अदालतों व न्यायाधीशों के प्रति सम्मान दो स्तंभों पर टिका होता है, पारदर्शिता और जवाबदेही। न्यायाधीशों को भी अपनी कार्यप्रणाली के प्रति सार्वजनिक रूप से जवाबदेह होना चाहिए।

माया दारूवाला
भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेने से कुछ दिन पहले न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालयों को यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए कि न्यायाधीश सुरक्षित (रिज़र्व) रखे गए फ़ैसले सुनाने में कितना समय लेते हैं। साथ ही न्यायिक कार्यप्रणाली से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण आंकड़े भी लोगों के सामने आने चाहिए।
इस टिप्पणी की वजह असल में झारखंड का एक मामला था। वहां आजीवन कारावास की सज़ा पाए चार क़ैदियों की अपीलों पर सुनवाई पूरी हो चुकी थी। लेकिन अंतिम फ़ैसला दो से तीन साल तक लंबित रहा। इन चार क़ैदियों में दो अनुसूचित जनजाति और दो अन्य पिछड़ा वर्ग से थे। वे इतने लंबे समय तक अनिश्चितता की स्थिति में इंतज़ार करते रहे।
देरी का सवाल केवल झारखंड की समस्या नहीं
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड में सुरक्षित रखे गए फ़ैसलों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई हो। पहले भी अदालत ने ऐसे मामलों के बढ़ते लंबित बोझ पर "आश्चर्य" जाहिर किया था। उसने न्यायाधीशों से आग्रह किया था कि वे स्वीकृत अवकाश का उपयोग लंबित आपराधिक और दीवानी अपीलों के निपटारे के लिए करें। साथ ही मृत्युदंड और आजीवन कारावास जैसे गंभीर मामलों की नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग की भी बात कही थी।
हालांकि यह समस्या केवल झारखंड तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और दिल्ली सहित कई राज्यों में सुरक्षित रखे गए फ़ैसलों का बढ़ता बैकलॉग न्यायिक व्यवस्था की गहरी संरचनात्मक समस्याओं की ओर संकेत करता है।
पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही
ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश पूरी तरह उचित है कि उच्च न्यायालयों को स्थगन, देरी के कारण और फ़ैसले अपलोड करने में लगने वाले समय की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। ऐसी कोई वजह सामने नहीं आती कि जो लोग इस देरी की क़ीमत चुका रहे हैं, उन्हीं से ही इस न्यायिक प्रदर्शन से जुड़े आंकड़े छिपाएं जाएं।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पारदर्शिता और समयबद्धता संबंधी टिप्पणियां न्यायपालिका की पुरानी और गहरी समस्याओं की ओर इशारा करती हैं। उनके पास अपने दो पूर्ववर्ती मुख्य न्यायाधीशों की तुलना में अपेक्षाकृत लंबा कार्यकाल होगा, लेकिन चुनौतियां इतनी बड़ी हैं कि यह समय भी कम पड़ सकता है।
स्वाभाविक रूप से वे न्यायपालिका को पहले से बेहतर स्थिति में छोड़कर जाना चाहेंगे। लेकिन उन्हें जो व्यवस्था विरासत में मिली है, उसमें भारी रिक्तियां, लगातार बढ़ते लंबित मामले और कमज़ोर बुनियादी ढांचे जैसी गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं।
रिक्त पद और लंबित मामलों का बोझ
वर्ष 2025 तक देश में ज़िला न्यायाधीशों के हर चार पदों में से एक ख़ाली था। उच्च न्यायालयों की स्थिति और ख़राब है, जहां जजों के लगभग हर तीन पदों में से एक रिक्त है।
झारखंड में उच्च न्यायालय के क़रीब 40 प्रतिशत पद और ज़िला अदालतों के लगभग 50 प्रतिशत पद ख़ाली हैं। इलाहाबाद, पटना, राजस्थान, ओडिशा और तेलंगाना जैसे उच्च न्यायालयों में रिक्तियों का स्तर 40 प्रतिशत से अधिक है।
बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में कुछ वर्षों के दौरान ज़िला अदालतों में 50 प्रतिशत से अधिक पद ख़ाली रहे। इन राज्यों में लंबित मामलों में से आधे से अधिक तीन वर्ष से ज़्यादा समय से अटके हुए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो पिछले पांच वर्षों में लंबित मामलों की संख्या लगभग 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है।
न्यायाधीशों पर बढ़ता कार्यभार
न्यायाधीशों पर काम का बोझ भी बेहद भारी है। एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को औसतन 7,000 से 10,000 मामलों को संभालना पड़ता है। यह लगभग तीन वर्षों के बैकलॉग के बराबर है। इनमें 2,500 से 3,500 मामले तो केवल आपराधिक प्रकृति के ही होते हैं।
ज़िला अदालतों के न्यायाधीशों के पास भी 2,200 से 4,000 मामलों का कार्यभार हो सकता है, जिनमें 1500 से 2500 तक केसों की संख्या आपराधिक मामलों की होती है। केसों की मौजूदा निपटारे की दर को देखते हुए कई उच्च न्यायालयों को केवल वर्तमान लंबित मामलों को समाप्त करने में ही 10 से 15 वर्ष लग सकते हैं।
दिसंबर 2024 में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार भारत में प्रति दस लाख आबादी पर केवल 21 न्यायाधीश हैं। यह संख्या दशकों पहले सुझाए गए 50 न्यायाधीश प्रति दस लाख आबादी के मानक से आधी से भी कम है। ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ के अनुसार वास्तविक कार्यरत न्यायाधीशों का अनुपात तो लगभग 15 प्रति दस लाख आबादी के आसपास ही है।

इस बीच जांच और मुक़दमों की धीमी प्रक्रिया के कारण इंतज़ार करने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। देश की 1,360 जेलों में बंद क़ैदियों में 75 प्रतिशत से अधिक विचाराधीन हैं, जबकि दोषी सिद्ध हो चुके क़ैदियों की हिस्सेदारी कई जगह 30 प्रतिशत से भी कम है।
न्यायिक पदों पर नियुक्तियां करना पर्याप्त नहीं
विचाराधीन क़ैदियों का जेल में रहने का औसत समय भी बढ़ा है। वर्ष 2019 में जहां यह अवधि लगभग तीन महीने थी, वहीं 2025 तक बढ़कर 10 महीने से अधिक हो गई। बड़ी संख्या में लोग इससे भी कहीं अधिक समय जेल में बिताते हैं। न्यायपालिका द्वारा लगातार चिंता जताने और निगरानी के बावजूद अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि स्थिति में बड़ा सुधार हो रहा है।
बेशक न्यायपालिका में रिक्त पदों को भरना इस समाधान का एक हिस्सा है, लेकिन केवल यही पर्याप्त नहीं होगा। भर्ती प्रक्रियाएं महीनों नहीं बल्कि वर्षों तक चलती हैं। कई बार न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच मतभेदों के कारण नियुक्तियां पूरी तरह रुक जाती हैं।
मान लीजिए कि सभी न्यायिक पद एक रात में भर भी जाएं, तब भी अदालतों में पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन उपलब्ध नहीं होंगे। एक रजिस्ट्रार, लिपिक, स्टेनोग्राफ़र या डेटा एंट्री ऑपरेटर की कमी भी पूरी व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

व्यापक सुधारों को तत्काल अपनाने की ज़रूरत
'तारीख़ पर तारीख़' की पुरानी समस्या से बाहर निकलने के लिए न्यायपालिका अब यह स्वीकार करने लगी है कि केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए व्यापक संस्थागत सुधारों की आवश्यकता है। समयसीमा का कड़ाई से पालन, बेहतर केस प्रबंधन और अनावश्यक देरी करने वाले पक्षकारों तथा वकीलों की जवाबदेही भी तय करनी होगी।
तकनीक का पूरा लाभ तभी मिल सकता है जब मज़बूत और भरोसेमंद डिजिटल ढांचा तेज़ी से तैयार हो और क़ानूनी समुदाय उसे पूरी तरह अपनाए। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि तकनीकी बदलाव न्याय तक समान और निष्पक्ष पहुंच को मज़बूत करते हैं। आपराधिक मामलों में वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग ने प्रशासनिक सुविधाएं ज़रूर बढ़ाई हैं, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इससे जेल में बिताया जाने वाला समय कम हुआ है या निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को बेहतर संरक्षण मिला है।
लंबित मामलों में चेक बाउंस और मोटर वाहन दुर्घटना संबंधी मामलों की हिस्सेदारी 10 से 12 प्रतिशत तक है। इनमें अकेले चेक बाउंस के लगभग 43 लाख मामले लंबित हैं। इन मामलों के बोझ को पांच वर्षों में 40 फ़ीसदी तक कम करने के लिए संक्षिप्त सुनवाइयां, फ़ास्ट ट्रैक अदालतें, संविदा पर न्यायाधीशों की नियुक्ति, डिजिटल समन और शिकायतों के मानकीकृत प्रारूप जैसे प्रयोग किए जा रहे हैं।
लेकिन इनका प्रभाव अभी सीमित है क्योंकि इन्हें समान रूप से लागू नहीं किया गया है। इसके अलावा मध्यस्थों का प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं होने और न्यायिक सहयोग भी हर जगह समान नहीं होने से भी यह कोशिश सफल नहीं हो पा रही है।

वकीलों की भूमिका और अदालत प्रबंधन
न्यायिक प्रक्रिया की गति उसकी सबसे कमज़ोर कड़ी से तय होती है और हमारी न्याय व्यवस्था में ऐसी कई कमज़ोर कड़ियां हैं। इनमें वकीलों की भूमिका भी शामिल है। वर्ष 2017 के एक अध्ययन में पाया गया था कि दिल्ली में मुक़दमों में होने वाली लगभग 80 प्रतिशत देरी की वजहें- स्थगन, अनुपस्थिति और देर से दाख़िल किए गए दस्तावेज़ हैं। इनमें अधिकांश ज़िम्मेदारी वकीलों की थी।
अनावश्यक रूप से स्थगन की आदत को कम करने के लिए आर्थिक दंड लगाया जाना एक प्रभावी तरीक़ा हो सकता है। संशोधित प्रक्रियाओं के नियमों में अदालतों को स्पष्ट शक्ति दी गई है कि वे स्थगनों को कम कर सकती हैं और जुर्माना लगा सकती हैं। हालांकि अदालतों के भीतर की शक्ति संरचनाओं ने लंबे समय से ऐसे क़दम उठाने में झिझक पैदा की है।
न्यायाधीशों को बेहतर प्रशिक्षण देने और उन्हें प्रशासनिक ज़िम्मेदारियां देने के बजाए केवल न्यायिक कार्यों में व्यस्त रखने से भी कम हो सकता है। दुनिया के कई देशों में कोर्ट मैनेजर और स्थायी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अदालतों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत में यह व्यवस्था अभी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पाई है। पहले किए गए प्रयोग सफल नहीं रहे, लेकिन इस विचार को फिर से अपनाने की ज़रूरत है।

सुधार की शुरुआत शीर्ष स्तर से
अक्सर न्यायपालिका की आलोचना की जाती है। लेकिन क़ानून के शासन वाले किसी भी लोकतंत्र में अदालतों और न्यायाधीशों के प्रति सम्मान अनिवार्य है। यह सम्मान दो स्तंभों पर टिका होता है- पारदर्शिता और जवाबदेही। न्यायाधीशों को भी अपनी कार्यप्रणाली के प्रति सार्वजनिक रूप से जवाबदेह होना चाहिए। उनकी प्रतिष्ठा केवल पद और अधिकारों पर नहीं, बल्कि जनता के विश्वास के आधार पर क़ायम रहनी चाहिए।
यदि मुख्य न्यायाधीश की अपील को वास्तव में प्रभावी बनाना है, तो सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। उसके पास ‘नेशनल जुडिशल डेटा ग्रिड’ जैसा मंच और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं। यदि वह सुरक्षित रखे गए फ़ैसलों और मामलों के निपटारे में लगने वाले समय के वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक करना शुरू करें, तो यह छोटा क़दम बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकता है। आख़िरकार सुधार हमेशा ऊपर से शुरू होता है। नेतृत्व जब उदाहरण प्रस्तुत करता है, तभी व्यवस्था बदलती है।
माया दारूवाला इंडिया जस्टिस रिपोर्ट की मुख्य संपादक हैं। यह लेख मूल रूप से 27 नवंबर 2025 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुआ था। इसका हिंदी अनुवाद हम साभार प्रकाशित कर रहे हैं।)
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