न्याय तक पहुंच की पहली सीढ़ी कमज़ोर क्यों?
पर्याप्त संसाधनों के बिना संविधान में निहित समान और सुलभ न्याय का वादा पूरा नहीं हो सकता।

अर्शी शौकत, सौम्या श्रीवास्तव, वलय सिंह
भारत में क़ानूनी सहायता संस्थाओं की स्थापना ‘विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987’ के तहत की गई थी। इन संस्थाओं का उद्देश्य देश की लगभग 80 प्रतिशत आबादी को मुफ़्त क़ानूनी सहायता उपलब्ध कराना है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन सेवाओं की पहुंच अभी भी सीमित है।
देश भर में अप्रैल 2023 से मार्च 2024 के बीच केवल 15.5 लाख लोगों को क़ानूनी सहायता संबंधी सेवाएं प्राप्त हुईं। यह संख्या पिछले वर्ष के 12.14 लाख लाभार्थियों की तुलना में 28 प्रतिशत अधिक है, लेकिन अब भी उस स्तर से काफ़ी कम है जिसकी कल्पना की गई थी।

ऊपर दिए ग्रैफ़िक में देखा जा सकता है कि IJR 1 और में IJR 4 में प्रति विधिक सहायता क्लीनिक कितने गांव हैं।
आमतौर पर क़ानूनी सहायता केंद्र स्थानीय अदालतों, जेलों और किशोर न्याय बोर्डों से जुड़े होते हैं। यहां पैनल में शामिल वकीलों के माध्यम से आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों, हिरासत में बंद व्यक्तियों और अन्य ज़रूरतमंद लोगों को मुफ़्त क़ानूनी सलाह और सहायता दी जाती है।
ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में क़ानूनी सहायता क्लीनिक कुछ गांवों को एकसाथ सेवाएं प्रदान करते हैं। ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, देश में औसतन हर 163 गांवों पर केवल एक क़ानूनी सहायता क्लीनिक है। इन सेवाओं की उपलब्धता काफ़ी हद तक वित्तीय और मानव संसाधनों पर निर्भर करती है।
क़ानूनी सहायता को जस्टिस सेक्टर का सबसे कम बजट?
पुलिस, जेल, न्यायपालिका और क़ानूनी सहायता को मिलाकर जो कुल न्यायिक क्षेत्र का बजट होता है, उसमें क़ानूनी सहायता का हिस्सा 1 प्रतिशत से भी कम है।
इस क्षेत्र के लिए धनराशि राज्य सरकारें भी उपलब्ध कराती हैं और केंद्र सरकार भी ‘राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण’ (नालसा) के माध्यम से सहायता देती है। नालसा यह राशि ‘राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों’ (SLSA) को अनुदान के रूप में देता है।
25 राज्यों में क़ानूनी सहायता के लिए कुल बजट 2017-18 के 601 करोड़ रुपए से बढ़कर 2022-23 में 1,086 करोड़ रुपए रहा। यानी पांच वर्षों में बजट लगभग दोगुना हो गया। इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण राज्यों द्वारा अपने बजट में किया गया इज़ाफ़ा था। राज्यों का कुल योगदान 394 करोड़ रुपए से बढ़कर 866 करोड़ रुपए हो गया।

कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश समेत 13 राज्यों ने क़ानूनी सहायता के लिए अपने बजट में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि की। इसके विपरीत, इसी अवधि में नालसा की ओर से मिलने वाली राशि 207 करोड़ रुपए से घटकर 169 करोड़ रुपए रह गई। साथ ही, नालसा द्वारा उपलब्ध कराई जा रही धनराशि के उपयोग में भी गिरावट आई। 2017-18 में जहां नालसा की 75 प्रतिशत राशि ख़र्च हुई थी, वहीं 2022-23 में यह घटकर 59 प्रतिशत रह गई।
ख़र्च पर कई तरह की सीमाएं और बाध्याताएं लागू
‘ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरणों’ के लिए जारी नालसा मैनुअल 2023 के अनुसार, राज्य प्राधिकरणों को कुछ मदों पर नालसा की पूर्व अनुमति के बिना ख़र्च करने की अनुमति नहीं है। इनमें फ़्रंट ऑफ़िस कर्मचारियों की नियुक्ति, वाहन और उपकरण ख़रीदना या किराए पर लेना, आउटसोर्स कर्मचारियों की सेवाएं लेना, पीड़ितों को मुआवज़ा, भोजन वितरण और वृक्षारोपण जैसी गतिविधियां तक शामिल हैं।
नालसा ने निर्देश दिया है कि उसकी ओर से दिए गए धन का उपयोग निर्धारित सीमाओं के भीतर ही किया जाए। इसके तहत 50 प्रतिशत धनराशि क़ानूनी सहायता और सलाह, 25 प्रतिशत जागरुकता कार्यक्रमों तथा 25 प्रतिशत वैकल्पिक विवाद समाधान और मध्यस्थता पर ख़र्च की जा सकती है।
2019 के बाद से क़ानूनी सहायता पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति ख़र्च लगभग 3 रुपए से बढ़कर 7 रुपए हो गया है। 2022-23 के वास्तविक ख़र्च के आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा ने प्रति व्यक्ति 16 रुपए ख़र्च किए, जो देश में सबसे अधिक था।

इसके विपरीत झारखंड और असम ने प्रति व्यक्ति केवल 5 रुपए ख़र्च किए। उत्तर प्रदेश ने 4 रुपए, बिहार ने 3 रुपए और पश्चिम बंगाल ने केवल 2 रुपए प्रति व्यक्ति ख़र्च किए। यह राष्ट्रीय औसत 7 रुपए से भी कम है।
पांच वर्षों में 40 फ़ीसदी वॉलनटियर की कमी, ज़मीन पर कमज़ोर तंत्र
वित्तीय प्राथमिकता की कमी और उपलब्ध धनराशि के सही उपयोग न होने का सबसे अधिक असर उन लोगों पर पड़ता है, जो ज़मीनी स्तर पर लोगों तक सेवाएं पहुंचाने का काम करते हैं। क़ानूनी सहायता व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले पैरा-लीगल वॉलनटियर आम लोगों और क़ानूनी सेवाओं के बीच पुल का काम करते हैं।
ये वॉलनटियर लोगों को क़ानूनी अधिकारों के बारे में जागरूक करते हैं, छोटे विवादों को सुलझाने में मदद करते हैं और ज़रूरतमंद लोगों को क़ानूनी सहायता से जोड़ते हैं।
लेकिन 2019 से 2024 के बीच इनकी संख्या में लगभग 38 प्रतिशत की गिरावट आई है। 2019 में प्रति लाख आबादी पर 5.7 पैरा-लीगल वॉलनटियर थे, जो 2023 में घटकर केवल 3.1 रह गए। पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में प्रति लाख आबादी पर केवल एक पैरा-लीगल वॉलनटियर उपलब्ध था।

प्रशिक्षण के बाद तैनाती का संकट या न्यूनतम मजदूरी से कम मानदेय
कम बजट का असर इन वॉलनटियर की नियुक्ति और तैनाती पर भी पड़ता है, जिन्हें प्रतिदिन के अनुसार मानदेय दिया जाता है। 2023-24 में लगभग 53,000 पैरा-लीगल वॉलनटियर को प्रशिक्षण दिया गया, लेकिन इनमें से केवल 14,000 को ही मैदान में तैनात किया गया। इसके मुक़ाबले 2019-20 में 63,000 लोगों को प्रशिक्षित किया गया था और 22,000 को तैनात किया जा सका।
एक और बड़ी समस्या इनके मानदेय की है। अधिकांश राज्यों में पैरा-लीगल वॉलनटियर को मिलने वाला दैनिक मानदेय न्यूनतम मज़दूरी से भी कम है। राज्य इसे बढ़ाने के इच्छुक भी नहीं दिखते। 31 मार्च 2023 तक केवल केरल ऐसा राज्य था, जहां इन्हें प्रतिदिन 750 रुपए दिए जाते थे। 22 राज्यों में यह राशि 500 रुपए प्रतिदिन थी। तीन राज्यों में 400 रुपए और गुजरात, मेघालय तथा मिज़ोरम में केवल 250 रुपए प्रतिदिन दिए जाते थे। यह राशि कई बार दैनिक ख़र्चों को पूरा करने के लिए भी पर्याप्त नहीं होती।
न्याय व्यवस्था का कार्यभार कम करने की पहल- LADC
2022 तक क़ानूनी सहायता से जुड़े वकील आरोपी और पीड़ित दोनों पक्षों के मामलों में सहायता प्रदान करते थे। लेकिन 2022 से नालसा ने नई केंद्रीय योजना- क़ानूनी सहायता रक्षा परामर्श प्रणाली (LADC) शुरू की है। इसका उद्देश्य केवल आरोपियों और दोषसिद्ध व्यक्तियों को समर्पित वकीलों के ज़रिए गुणवत्तापूर्ण क़ानूनी सहायता उपलब्ध कराना है।
यह योजना पब्लिक डिफ़ेंडर प्रणाली की तर्ज पर तैयार की गई है और इसे मौजूदा क़ानूनी सहायता व्यवस्था के पूरक के रूप में लागू किया गया है। वर्तमान में यह योजना देश के 670 ज़िलों में से 610 ज़िलों में संचालित हो रही है। 2023-24 में नालसा ने इस योजना के लिए 200 करोड़ रुपए का विशेष प्रावधान किया था और पूरी राशि ख़र्च भी की गई। हालांकि 2024-25 में इसका बजट घटाकर 147.9 करोड़ रुपए कर दिया गया।
यह योजना काफ़ी संभावनाएं रखती है क्योंकि इससे अन्य वकीलों और पूरी न्याय व्यवस्था का कार्यभार कम हो सकता है। लेकिन योजना अभी शुरुआती चरण में है, इसलिए इसकी सफलता का अंतिम आकलन करना जल्दबाजी होगी।
केवल फ़ंड नहीं, लोगों का भरोसा जीतना भी ज़रूरी
हाल के वर्षों में राज्यों ने क़ानूनी सहायता के लिए बजट बढ़ाने के प्रयास किए हैं। इसके बावजूद कई पुरानी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। सेवाओं की गुणवत्ता में असमानता, जवाबदेही की कमी और लोगों का कम भरोसा इस प्रणाली के असर को प्रभावित करते हैं।
इनमें से कई समस्याओं को अतिरिक्त धन और पर्याप्त मानव संसाधनों के ज़रिए दूर किया जा सकता है। यदि क़ानूनी सहायता व्यवस्था को वास्तव में प्रभावी बनाना है, तो उसकी क्षमता बढ़ाना ज़रूरी है। पर्याप्त संसाधनों और कर्मचारियों के बिना यह व्यवस्था संविधान में निहित समान और सुलभ न्याय के वादे को पूरा नहीं कर पाएगी।
(अर्शी शौकत, सौम्या श्रीवास्तव और वलय सिंह इंडिया जस्टिस रिपोर्ट से संबद्ध हैं। यह लेख मूल रूप से 4 अगस्त 2025 को द हिंदू में प्रकाशित हुआ था। इसका हिंदी अनुवाद हम साभार प्रकाशित कर रहे हैं।)
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