महिलाओं की आज़ादी का अधूरा सच

क़ानून बराबरी देता है, लेकिन समाज महिलाओं की आज़ादी पर पहरे बिठाता है। मैरिटल रेप से लेकर लिव-इन रिश्तों एक ही सवाल है, महिला को पसंद से जीने का अधिकार कब मिलेगा?

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माया दारूवाला


भगवान और संविधान का शुक्र है कि भारत में कम से कम काग़ज़ पर महिलाएं स्वतंत्र और समान हैं। लेकिन क्या हक़ीक़त भी ऐसी ही है?


क़ानून और ज़मीन पर दिखने वाली स्थिति में बड़ा अंतर है। समानता और आज़ादी का रास्ता अभी भी आसान नहीं है।


महिलाओं की स्थिति पर बार-बार बहस करनी पड़ती है। उनके अधिकारों का बचाव करना पड़ता है। यही बताता है कि समानता और स्वतंत्रता की स्थिति आज भी लगातार बदल रही है।


संविधान में बराबरी, समाज में विरोधाभास

भारतीय संविधान महिलाओं की समानता के लिए मज़बूत क़ानूनी ढांचा देता है। महिलाओं को ऐतिहासिक रूप से हुए नुक़सान को पहचानते हुए संविधान भेदभाव पर रोक लगाता है। समानता के लिए क़ानून और संस्थागत व्यवस्था भी बनाई गई है।


लेकिन इसका पूरा असर अब भी दिखाई नहीं देता। समानता से जुड़ी नीतियां और क़ानून हर जगह एक जैसी मज़बूती से लागू नहीं होते। कई बार सामाजिक सोच और परंपराएं उनका रास्ता रोक देती है।


इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 बताती है कि न्याय व्यवस्था के किस क्षेत्र में महिलाओं की कितनी उपस्थिति है। स्पष्ट है कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व अब भी कई जगहों पर नाममात्र का है।


भारत में रोज़ संविधान की ज़िम्मेदारियों और समाज की पुरानी मान्यताओं के बीच टकराव दिखाई देता है। एक सामंती सोच वाले समाज का आधुनिकता की ओर बढ़ना कई तरह के संघर्ष और विरोधाभास पैदा करता है।


मैरिटल रेप का विरोधाभास

मैरिटल रेप इसका बड़ा उदाहरण है। 'मैरिटल रेप' यानी वैवाहिक बलात्कार शब्द में ही एक विरोधाभास छिपा है।


एक ओर यह मानता है कि बलात्कार का मूल तत्व मौजूद है। यानी महिला की वास्तविक सहमति नहीं थी। दूसरी ओर 'वैवाहिक' शब्द जोड़ते ही उसे क़ानूनी और सामाजिक छूट मिल जाती है। मानो कहा जा रहा हो- हां, यह बलात्कार है, लेकिन इसके लिए जेल नहीं होगी।


मैरिटल रेप को सज़ा के दायरे से बाहर रखने की सोच इस सिद्धांत पर टिकी है कि शादी होते ही महिला ने हमेशा के लिए यौन संबंधों के लिए अपनी सहमति दे दी। जैसे पति को उसके शरीर पर किसी तरह का अधिकार मिल गया हो।


यह सोच इस बात को स्वीकार करती है कि 'परिवार' को बचाने के नाम पर यौन हिंसा भी सहन की जा सकती है। लेकिन सवाल है, ऐसे परिवार की वैधता क्या है, जिसकी नींव महिलाओं के उत्पीड़न और यौन ग़ुलामी पर टिकी हो?


अगर शादी को 'पवित्र' माना जाता है, तो उसका अर्थ क्या रह जाता है? क्या किसी ऐसे काम की इजाज़त दी जा सकती है, जो किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा किया जाए तो अपराध माना जाएगा, लेकिन शादी के नाम पर वही काम अपराध नहीं रहेगा?


शादी में 'ना' और बाहर 'हां' की स्वीकारोक्ति का सवाल

विडंबना यह है कि शादी के अंदर महिला की 'ना' को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वहीं शादी के बाहर उसकी 'हां' को भी अक्सर स्वीकार नहीं किया जाता। अगर वह अपनी इच्छा से ऐसा रिश्ता चुनती है, जिसे परिवार या समाज सही नहीं मानता, तो उसकी पसंद पर सवाल उठाए जाते हैं।


कई बार वयस्क महिला का व्यवहार भी परिवार को 'अशोभनीय' लगता है। उदाहरण के लिए, अगर वह घर से चली जाए, लिव-इन रिलेशनशिप में रहे या परिवार की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी कर ले।


ऐसे मामलों में उसे दोबारा नियंत्रण में लाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। पुलिस में उसके नाबालिग होने, तस्करी या अपहरण की शिकायत तक दर्ज कराई जाती है।


दुर्भाग्य से राज्य की संस्थाएं भी कई बार क़ानून के बजाय समाज की साझा नैतिकता के आधार पर प्रतिक्रिया देती हैं। जबकि क़ानून एक वयस्क महिला को अपनी पसंद से जीवन जीने का पूरा अधिकार देता है। उसे राज्य की सभी एजेंसियों से सुरक्षा पाने का भी अधिकार है।


'बदचलन' और 'बागी' कहकर नियंत्रण करने की कोशिश

महिलाओं के व्यवहार को लेकर असहमति कई रूपों में सामने आती है। उन्हें 'बुरी', 'बाग़ी' या 'ग़ैरक़ानूनी' कहकर निशाना बनाया जाता है।


धर्म और परंपरा का भी सहारा लिया जाता है। विवाह से पहले संबंधों को गलत बताने वाली धारणाएं सामने लाई जाती हैं। कई बार ऐसी सोच मध्यकालीन दौर की कड़ी सज़ाओं तक की पैरवी करती है।


यौन नियंत्रण और महिला की व्यक्तिगत पसंद पर रोक, असमानता की बड़ी व्यवस्था को बनाए रखने के साधन हैं।


देश भर में पुलिसबल में महिलाओं की भागीदारी की स्थिति कई राज्यों में चिंताजनक है। जिस गति से महिलाएं पुलिस में आ रही हैं, कई राज्यों को पुलिसबल में 33% महिलाएं नियुक्त करने में सैकड़ों वर्ष तक लग सकते हैं।   


लिव-इन रिश्तों पर राज्य का नियंत्रण

हाल में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य की नई समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी के तहत लिव-इन रिश्तों का अनिवार्य पंजीकरण बरकरार रखा।


रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत ने साथ रहने को लेकर 'बेबाकी' या 'बेशर्मी' जैसी टिप्पणी भी की। अदालत ने यह तर्क दिया कि राज्य लिव-इन रिश्तों पर रोक नहीं लगा रहा। वह केवल उन्हें नियंत्रित कर रहा है।


इसका अर्थ यह निकला कि अगर कोई रिश्ता ख़ुले तौर पर चल रहा है, तो वह निजी नहीं रह जाता।


लेकिन यह एक ग़लत रवायत है। कोई रिश्ता समाज को दिखाई दे रहा है, इससे यह सही नहीं ठहराया जा सकता कि राज्य को उसे अनिवार्य रूप से दर्ज कराने का अधिकार मिल गया।


सुरक्षा के नाम पर निगरानी?

किसी रिश्ते का पंजीकरण अनिवार्य करना और उसका पालन न करने पर सज़ा का प्रावधान गंभीर सवाल खड़े करता है। यह निजी ज़िंदगी में राज्य के दख़ल का मामला बन जाता है। 'सुरक्षा' देने के नाम पर यह निगरानी का रास्ता खोल सकता है।


इससे भी गंभीर बात यह है कि राज्य का काम हर व्यक्ति को किसी भी ख़तरे से सुरक्षा देना है। लेकिन ऐसा क़ानून यह संकेत देता है कि किसे सुरक्षा मिलेगी और किसे नहीं, यह राज्य की पसंद पर निर्भर हो सकता है। यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर कौन 'सुरक्षा का हक़दार' माना जाएगा।


सुप्रीम कोर्ट की सोच से टकराव

यह पूरी सोच सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों के विपरीत जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार लिव-इन रिश्तों की वैधता को स्वीकार किया है।


अदालत ने निजता के अधिकार और बिना अनुचित हस्तक्षेप के साथ रहने के अधिकार की भी पुष्टि की है। यूसीसी इन अधिकारों को कमजोर करता दिखाई देता है।


महिलाओं की सुरक्षा कोई विशेष सुविधा नहीं

संविधान की मांग साफ है। हर नागरिक की तरह महिलाओं को भी सार्वजनिक और निजी जीवन में सुरक्षित महसूस होना चाहिए।


यह इसलिए नहीं कि महिलाएं किसी विशेष रूप से कमज़ोर वर्ग की सदस्य हैं। बल्कि इसलिए कि वे क़ानून के राज वाले देश में अपने फ़ैसले ख़ुद लेने का अधिकार रखती हैं।


राज्य का दायित्व है कि वह इस अधिकार की रक्षा करे। साथ ही उसे उन पुरानी परंपराओं की बेड़ियां हटाने की दिशा में भी काम करना चाहिए, जो महिलाओं को बराबरी का स्थान देने से रोकती हैं।


बदलती संस्कृति और पुरानी सोच

संस्कृति स्थिर नहीं होती। वह समय के साथ बदलती है। समाज भी नई सोच को अपनाता है। न्याय और समानता से जुड़ी बातों को जगह मिलती है। वहीं उन पुरानी धारणाओं और प्रथाओं को पीछे छोड़ना ज़रूरी है, जिनका तर्क और औचित्य अब खत्म हो चुका है। लेकिन यह बदलाव हर जगह एक जैसी गति से नहीं आता।


महिला दिवस का असली सवाल

हर साल महिला दिवस आता रहेगा। फिर आएगा। और उसके बाद भी आएगा। लेकिन महिलाओं की समानता और बराबरी की लड़ाई जारी रहेगी। समानता और न्याय केवल महिलाओं के अधिकारों का सवाल नहीं हैं। ये देश की सामाजिक स्थिरता और आर्थिक प्रगति की बुनियाद भी हैं।


महिलाओं का सम्मान करना संविधान का सम्मान करना है। और महिलाओं के अधिकारों से इनकार करना भेदभाव है।


(माया दारूवाला इंडिया जस्टिस रिपोर्ट की मुख्य संपादक हैं। यह लेख मूल रूप से पिछले वर्ष के अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस यानी 8 मार्च 2025 को द ट्रिब्यून में प्रकाशित हुआ था। हम इसका हिंदी अनुवाद साभार प्रकाशित कर रहे हैं।)



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