न्याय दिला पा रहे हैं मानवाधिकार आयोग?

IJR दिसंबर 2026 में राज्य मानवाधिकार आयोगों में रिक्त पदों, कार्यभार, बजट आदि पहलुओं का विश्लेषण कर रिपोर्ट लाने जा रहा है।

 · 5 min read

भारत सिंह


मानवाधिकारों की रक्षा के लिए किसी राज्य में मानवाधिकार आयोग का होना कितना महत्वपूर्ण है, इसे तीन हालिया घटनाओं से समझा जा सकता है।


पहली घटना महाराष्ट्र के पुणे में 22 जुलाई को हुई। पुलिस ने हत्यारोपियों को कार के बोनट पर बांधकर घुमाया। 3 अगस्त को महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग ने पुलिस को नोटिस दिया।


दूसरी घटना 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस लाठीचार्ज की है। पांच दिन बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर से हिंसा और बल प्रयोग पर जवाब मांगा।


तीसरी घटना 10 अगस्त को रांची में छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस लाठीचार्ज की है। लेकिन झारखंड में 2023 के बाद से मानवाधिकार आयोग में चेयरमैन या सदस्य नहीं हैं। इसलिए राज्य आयोग से कोई नोटिस नहीं भेजा जा सका।


इसी बीच 2021 की एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद गुवाहाटी हाई कोर्ट के आदेश पर 29 जुलाई 2026 को मिज़ोरम में राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन हुआ।


इन घटनाओं के बीच अहम सवाल है कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए राज्य आयोग मौजूद, सुलभ, सक्षम और स्वतंत्र हैं?


इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 में 23 राज्य मानवाधिकारआयोगों की रैंकिंग की गई। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि हमें केवल 23 राज्य आयोगों के ही आंकड़े उपलब्ध हो सके।


राज्य मानवाधिकार आयोगों का उद्देश्य सरकार या सरकारी संस्थाओं द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन पर नजर रखना और जांच करना है। इसी उद्देश्य से 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बना। इसके बाद राज्यों में भी मानवाधिकार आयोग बने।


लेकिन आयोग बनाना पहला क़दम है। असली सवाल है कि नागरिकों की इन तक पहुंच कितनी आसान है? इनके पास पर्याप्त संसाधन और कर्मचारी हैं या नहीं? ये सरकार तथा पुलिस के प्रभाव से कितनी स्वतंत्रता से काम कर सकते हैं?


राज्य मानवाधिकार आयोग क्यों ज़रूरी हैं?


मिज़ोरम में आयोग के गठन के साथ ही सभी 28 राज्यों में मानवाधिकार आयोगों बन चुके हैं। आठ केंद्र शासित प्रदेशों में आयोग नहीं हैं। दिल्ली आबादी के लिहाज़ से सबसे बड़ा केंद्र शासित प्रदेश है। चंडीगढ़ के मामले पंजाब मानवाधिकार आयोग देखता है। 


जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद वहां का राज्य आयोग भंग कर दिया गया और अब राष्ट्रीय आयोग मामले देखता है। पुडुचेरी में 2017 में राज्य मानवाधिकार समिति का गठन किया गया था। बाक़ी केंद्र शासित प्रदेशों में मानवाधिकार उल्लंघन के मामले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग देखता है।


राज्य मानवाधिकार आयोगों में अध्यक्ष और सदस्यों के अलावा जांच विभाग में भी रिक्तियां चिंता का विषय हैं। इससे हर स्तर पर आयोग की कार्यवाही प्रभावित होती है।  


राज्य स्तरीय आयोग इसलिए ज़रूरी है क्योंकि वह नागरिकों के अधिक क़रीब होता है। राष्ट्रीय आयोग पूरे देश से शिकायतें ले सकता है, लेकिन दूरदराज़ इलाक़ों में रहने वाले हर नागरिक के लिए दिल्ली तक पहुंचना आसान नहीं है।


आयोग नहीं हैं तो न्याय तक पहुंच कितनी मुश्किल?

केंद्र शासित प्रदेशों के दूरदस्थ क्षेत्रों के मानवाधिकार उल्लंघन स्थानीय स्तर से आगे नहीं आ पाते। ऐसे मामले अनदेखे रह सकते हैं। भाषा, इंटरनेट, डिजिटल साक्षरता, भौगोलिक दूरी और जानकारी की कमी भी आड़े आती हैं।


आयोग द्वारा स्वतः संज्ञान एक हल है, लेकिन इसका इस्तेमाल सीमित है। 2021-22 में सभी राज्य आयोगों ने 628 मामलों में मामलों में स्वतः संज्ञान लिया। 2022-23 में यह संख्या 1,045 और 2023-24 में 1,930 हो गई। फिर भी यह सभी राज्यों में दर्ज केसों का 1.6% था। 


आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में राज्य मानवाधिकार आयोगों से अधिक अनुपात में शिकायतों का निपटारा किया जाता है।  


शिकायतें आती हैं, लेकिन कितनी टिकती हैं?

आयोगों में आने वाली अधिकांश शिकायतें शुरुआती स्तर पर यह कहकर निपटा दी जाती हैं कि ये आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। इन्हें भी निपटाए मामलों में गिना जाता है। 2022-23 में 12 राज्यों में आधे से अधिक मामलों को इसी वजह से शुरुआत में ख़ारिज किया गया। 


दूसरी ओर, 2020-21 में सभी राज्य आयोगों की औसत राष्ट्रीय निपटान दर 75% रही, जो 2023-24 में बढ़कर 87% हो गई।


लेकिन ऊंची निपटान दर बेहतर कामकाज़ का प्रमाण नहीं है। यह देखना ज़रुरी है कि कितने मामलों की जांच और सुनवाई हुई और कितने शुरुआत में ख़ारिज किए गए।


पश्चिम बंगाल को SHRC की रैंकिंग में इसलिए फ़ायदा हुआ क्योंकि उसने सर्वाधिक शिकायतें शुरुआत में ही ख़ारिज कर दीं। इन शिकायतों को भी निपटाई गई शिकायतों में गिना जाता है। 


आयोगों के नेतृत्व और बजट की कमी

आयोगों में पूर्णकालिक अध्यक्ष और सदस्यों की उपलब्धता भी चिंता का विषय है। 2022-23 में 21 आयोगों में से केवल एक में पूर्णकालिक अध्यक्ष था, जबकि तीन आयोगों में सदस्य ही कार्यकारी अध्यक्ष थे।


आयोगों में सामान्यतः जांच, न्याय और प्रशासनिक विभाग होते हैं। पर्याप्त कर्मचारी न होने से जांच और निपटारे पर असर पड़ता है। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के मुताबिक, 2023-24 में सात राज्यों के जांच विभागों में 50 प्रतिशत से अधिक पद रिक्त थे। तीन राज्यों में जांच विभाग ही नहीं था।


राज्य मानवाधिकार आयोग की संरचना में शामिल पदाधिकारियों में से किसी की भी कमी होने पर प्रशासनिक या न्यायिक कार्य बाधित हो जाते हैं और आयोग पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाता है। 


मानवाधिकार उल्लंघन होने पर समय पर जांच अहम है। पर्याप्त कर्मचारी न होने से केस निपटारे में देरी होगी और पीड़ित को राहत मिलने की संभावना भी प्रभावित होगी।


दूसरी बड़ी चुनौती संसाधनों की है। 2018-19 से 2022-23 तक राज्य आयोगों का बजट 99 करोड़ से बढ़कर 142 करोड़ रुपए हुआ। हालांकि, आयोग इसमें से 82 प्रतिशत ही ख़र्च कर सके। 11 राज्यों ने बजट का 70-90 प्रतिशत ही इस्तेमाल किया।


कुछ आयोगों की वेबसाइट पर स्थानीय भाषा में शिकायत करने और उसकी प्रगति देखने की सुविधा नहीं थी।


इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 में SHRC का मूल्यांकन चित्र में दिए गए बिंदुओं के आधार पर भी किया गया कि उनकी वेबसाइट पर कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध हैं। 


सबसे बड़ा सवाल, कितने स्वतंत्र हैं आयोग

आयोगों के सामने संस्थागत स्वतंत्रता की चुनौती भी है। आयोगों के जांच विभाग पुलिस पर निर्भर होते हैं। ऐसे में पुलिस के ख़िलाफ़ आने वाली शिकायतों की जांच कितनी स्वतंत्र और निष्पक्ष होगी, यह स्वाभाविक सवाल है।


आयोगों का काम ही सरकारी अधिकारियों और संस्थाओं के ख़िलाफ़ मानवाधिकार उल्लंघन की जांच करना है। इसलिए जांच व्यवस्था को उसी तंत्र पर निर्भर रखना, गंभीर चुनौती है।


आयोगों के गठन से आगे की चुनौती

राज्य मानवाधिकार आयोगों के सामने चुनौती सिर्फ़ बाक़ी केंद्र शासित प्रदेशों में आयोग बनाने की ही नहीं है। मौजूदा आयोगों को सक्षम, सुलभ और स्वतंत्र रखने की भी है।


राज्य मानवाधिकार आयोगों में शिकायत मिलने के बाद उस पर कई चरणों में कार्रवाई होती है। लेकिन इस प्रक्रिया में एक भी स्तर पर कर्मचारी की कमी हो तो पूरी प्रक्रिया बाधित हो जाती है।  


जल्द जारी होगी मानवाधिकार आयोगों पर रिपोर्ट 

आयोगों की सफलता को चार कसौटियों पर परखा जाना चाहिए। क्या आसानी से शिकायत संभव है? क्या पर्याप्त बजट, कर्मचारी और पूर्णकालिक नेतृत्व है? क्या शिकायतों की जांच और सुनवाई प्रभावी ढंग से होती है? क्या आयोग सरकार व पुलिस के से स्वतंत्र है?


‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ की राज्य मानवाधिकार आयोगों पर विस्तृत रिपोर्ट दिसंबर 2026 में आएगी। इसमें आयोगों की संरचना, विभागों का गठन, कर्मचारियों की रिक्तियां, कार्यभार और बजट समेत कई पहलुओं का विश्लेषण होगा।


(भारत सिंह ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ में संचार सलाहकार हैं।)


Add a comment
Ctrl+Enter to add comment

C
गिरीश चंद्र 2 days ago

सरकार को जगाने के लिए यह बहुत ही अच्छा लेख है भारत जी का।